मुरैना में फैक्टरियों के प्रदूषण पर सवाल, सांक-आसन नदियों के अस्तित्व पर संकट! समाजसेवियों ने उठाई बंद कराने की मांग

मुरैना। जिले के बानमोर और सीतापुर औद्योगिक क्षेत्रों में संचालित फैक्टरियों से कथित तौर पर निकलने वाले औद्योगिक अपशिष्ट और धुएं को लेकर पर्यावरण प्रदूषण का मुद्दा गरमा गया है। समाजसेवियों ने आरोप लगाया है कि औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाला प्रदूषित पानी सांक और आसन नदियों को नुकसान पहुंचा सकता है। वहीं, फैक्टरियों से निकलने वाले धुएं को लेकर भी स्थानीय स्तर पर चिंता जताई जा रही है। समाजसेवियों ने जिला प्रशासन और प्रदूषण नियंत्रण विभाग से मामले की निष्पक्ष जांच कराकर दोषी इकाइयों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने तथा जरूरत पड़ने पर उनका संचालन बंद कराने की मांग की है।

सांक-आसन नदियों को बताया अपनी गंगा-यमुना

समाजसेवी रामचित्र महाना ने कहा कि सांक और आसन नदियां क्षेत्र के लोगों के लिए गंगा-यमुना के समान महत्व रखती हैं। इन नदियों से क्षेत्र की प्राकृतिक संपदा और पर्यावरण जुड़ा हुआ है। ऐसे में यदि औद्योगिक अपशिष्ट के कारण नदियों का पानी प्रदूषित हो रहा है, तो यह गंभीर चिंता का विषय है। उन्होंने सवाल उठाया कि एक ओर नदियों की सफाई और संरक्षण के लिए अभियान चलाए जाते हैं, वहीं दूसरी ओर औद्योगिक प्रदूषण की शिकायतों पर प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित करना भी जरूरी है। उन्होंने संबंधित विभागों से यह जांच कराने की मांग की कि औद्योगिक इकाइयां पर्यावरणीय मानकों का पालन कर रही हैं या नहीं, उनके अपशिष्ट उपचार संयंत्र ठीक से काम कर रहे हैं या नहीं और भूजल के उपयोग सहित अन्य गतिविधियों के लिए जरूरी अनुमतियां ली गई हैं या नहीं।

इन औद्योगिक इकाइयों की जांच की मांग

समाजसेवियों ने सीतापुर औद्योगिक क्षेत्र की सात्विक एग्रो प्राइवेट लिमिटेड, जायडेक्स केमिकल फैक्ट्री और मयूरी यूनिकॉर्नर्स सहित बानमोर क्षेत्र की श्रीराम ब्रदर्स, मॉडर्न, अंबा शक्ति, शीतल फूड ऑर्गेनिक, बीआर इंडस्ट्रीज, ग्लोबल बायोफ्यूल, एसआरएस और जेएसडब्ल्यू स्टील प्लांट जैसी औद्योगिक इकाइयों की गतिविधियों की जांच कराने की मांग की है। आरोप है कि कुछ औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाला धुआं और अपशिष्ट आसपास के पर्यावरण को प्रभावित कर सकता है। हालांकि, संबंधित इकाइयों के खिलाफ लगाए गए आरोपों की पुष्टि के लिए प्रदूषण नियंत्रण विभाग की जांच, पानी और हवा के नमूनों की वैज्ञानिक रिपोर्ट तथा संबंधित दस्तावेजों की जांच आवश्यक है।

शाम ढलते ही धुएं को लेकर शिकायतें

समाजसेवियों का कहना है कि बानमोर औद्योगिक क्षेत्र में शाम के समय कुछ फैक्टरियों से निकलने वाले धुएं को लेकर शिकायतें सामने आती रही हैं। उनका आरोप है कि यदि औद्योगिक इकाइयों से निर्धारित मानकों से अधिक प्रदूषण फैल रहा है, तो इसका असर आसपास रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता पर पड़ सकता है। उन्होंने क्षेत्र में वायु गुणवत्ता की नियमित निगरानी कराने और प्रदूषण के संभावित स्वास्थ्य प्रभावों का वैज्ञानिक आकलन कराने की मांग की है। साथ ही, यह भी कहा कि प्रदूषण और गंभीर बीमारियों के बीच संबंध को लेकर किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए प्रमाण आधारित जांच जरूरी है।

‘घड़ियालों की सुरक्षा जरूरी, तो इंसानों की जिंदगी भी अनमोल’

रामचित्र महाना ने कहा कि चंबल नदी में घड़ियालों और अन्य जलीय जीवों के संरक्षण के लिए विशेष प्रयास किए जाते हैं। ऐसे में नदियों को प्रदूषण से बचाने और आम लोगों के स्वास्थ्य की सुरक्षा को भी समान गंभीरता से लिया जाना चाहिए। उन्होंने मांग की कि संबंधित विभाग औद्योगिक इकाइयों के अपशिष्ट उपचार संयंत्रों, प्रदूषण नियंत्रण उपकरणों, उत्सर्जन स्तर और आवश्यक अनुमतियों की जांच करें। यदि किसी इकाई में पर्यावरणीय नियमों का उल्लंघन पाया जाता है, तो नियमानुसार कार्रवाई की जाए। गंभीर उल्लंघन की स्थिति में संबंधित इकाई का संचालन बंद कराने जैसे कदम भी उठाए जाएं।

गौरव चतुर्वेदी ने भी उठाई कार्रवाई की मांग

समाजसेवी गौरव चतुर्वेदी ने भी बानमोर और सीतापुर औद्योगिक क्षेत्रों में कथित प्रदूषण को लेकर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि चंबल अंचल की आबोहवा और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा के लिए शिकायतों की निष्पक्ष जांच जरूरी है। यदि कोई उद्योग पर्यावरणीय मानकों का उल्लंघन करता पाया जाता है, तो उसके जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि जब स्थानीय स्तर पर प्रदूषण को लेकर शिकायतें की जा रही हैं, तो उनकी जांच और समाधान की स्थिति सार्वजनिक क्यों नहीं की जाती। उन्होंने जिला प्रशासन से पारदर्शी कार्रवाई करने और जांच के निष्कर्षों की जानकारी आम लोगों को देने की मांग की।

प्रशासन की जांच और कार्रवाई पर टिकी निगाहें

बानमोर और सीतापुर औद्योगिक क्षेत्रों में प्रदूषण को लेकर उठ रहे सवालों के बीच अब जिला प्रशासन और प्रदूषण नियंत्रण विभाग की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। सांक और आसन नदियों के पानी की गुणवत्ता, औद्योगिक अपशिष्ट के निस्तारण और फैक्टरियों से निकलने वाले धुएं की जांच से वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकती है।अब बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रशासन संबंधित औद्योगिक इकाइयों की निष्पक्ष जांच कराएगा और पर्यावरणीय नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर कार्रवाई करेगा? फिलहाल, समाजसेवियों ने नदियों और क्षेत्र की आबोहवा को सुरक्षित रखने के लिए ठोस कदम उठाने की मांग की है।

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